3 जून 2019 - 14:47
पंद्रह ख़ुर्दाद की घटना की बरसी के उपलक्ष्य में विशेष कार्यक्रम

ईरानी राष्ट्र के संघर्ष के इतिहास में 15 ख़ुर्दाद का आंदोलन निर्णायक घटनाओं में से एक है।

इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना का ईरानी राष्ट्र के भविष्य पर गहरा असर पड़ा और इसने इस्लामी क्रान्ति की सफलता का मार्ग समतल किया। इसलिए इस घटना को वर्चस्ववादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ ईरानी राष्ट्र के संघर्ष के जन्म लेने में निर्णायक माना जाता है। ईरान के राजनैतिक इतिहास में ऐसी घटनाएं मौजूद हैं जिन्हें वर्चस्ववादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष के उदाहरण के तौर पर पेश किया जाता है। इन्हीं विशेषताओं वाली घटना 15 ख़ुर्दाद की भी है। 15 ख़ुर्दाद आंदोलन के अस्तित्व में आने के पीछे राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक कारण थे।

15 ख़ुर्दाद के आंदोलन की मुख्य पहचान यह है कि यह आंदोलन ईरान में अमरीकी हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ हुआ था। 19 अगस्त 1953 का सैन्य विद्रोह और उसके बाद राजनैतिक घटनाओं का क्रम, जिनमें साम्राज्यवादी शक्तियों के हस्तक्षेप से लेकर केपिचुलेशन क़ानून शामिल है, 15 ख़ुर्दाद 1342 बराबर 5 जून 1963 के आंदोलन के जन्म लेने की पृष्ठिभूमि बना और अंततः इसके नतीजे में ईरान में अत्याचारी शाही शासन का अंत हुआ।

इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह का 1963 का मशहूर भाषण साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ था। इस भाषण के कारण इमाम ख़ुमैनी को गिरफ़्तार किया गया और फिर देशनिकाला दे दिया गया। इस भाषण का ईरानी राष्ट्र के आंदोलन पर गहरा असर पड़ा जो बाद में वर्चस्ववादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ ईरानी राष्ट्र के संघर्ष में निर्णायक मोड़ बना। इमाम ख़ुमैनी ने 15 ख़ुर्दाद के ऐतिहासिक आंदोलन के ज़रिए ईरान से अमरीकी साम्राज्य के संबंध को चुनौती दी। उस समय ईरान में शाही शासन ने ऐसा घुटन का माहौल बना दिया था कि जनता को किसी प्रकार की आलोचना का अधिकार नहीं था।

इमाम ख़ुमैनी ने 1963 में 15 ख़ुर्दाद या पांच जून की घटना से पहले पवित्र नगर क़ुम के ऐतिहासिक फ़ैज़िया मदरसे में जो भाषण दिया था उसने शाही शासन की पोल खोल दी और पिछले दसियों साल से ईरानी जनता पर हो रहे अत्याचारों को उजागर कर दिया। शाही शासन पूरी तरह से साम्राज्य का पिट्ठू बना हुआ था और इस बात पर ईरानी जनता बहुत अधिक क्रोधित थी। इमाम ख़ुमैनी ने आशूरा के दिन अपने भाषण में शाह की सरकार के लक्ष्यों और उसके द्वारा अमरीका व इस्राईल के आदेशों के पालन के कारणों को खुल कर बयान कर दिया। उनके इस भाषण के बाद सरकार की ओर से उनके ख़िलाफ़ अत्यंत कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई।

पंद्रह ख़ुर्दाद वर्ष 1342 हिजरी शमसी बराबर 5 जून 1963 को भोर के समय क़ुम में इमाम ख़ुमैनी के घर पर शाह के कारिंदों ने धावा बोल दिया और उन्हें गिरफ़्तार करके तेहरान पहुंचा दिया गया। उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर जंगल की आग की तरह फैल गई और क़ुम, तेहरान, वरामीन, मशहद और शीराज़ जैसे शहरों में जनता की ओर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। ये प्रदर्शन कई दिन तक जारी रहे और शाह के सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर हमला करके कई को हताहत, घायल और गिरफ़्तार किया। यद्यपि कुछ दिनों के बाद इमाम ख़ुमैनी को छोड़ दिया गया लेकिन शाह के विरोध का क्रम जारी रहा और इमाम ख़ुमैनी न केवल यह कि चुप नहीं बैठे बल्कि उन्होंने अधिक जोश से शाह और साम्राज्य पर हमले जारी रखे। इसके चलते कुछ दिनों बाद फिर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और इस बार उन्हें देश से निर्वासित कर दिया गया। वे पहले कुछ दिनों तक तुर्की में निर्वासन का जीवन बिताते रहे और फिर वहां से उन्हें फ़्रान्स भेज दिया गया।

पंद्रह ख़ुर्दाद आंदोलन के कारणों पर नज़र डालने से पता चलता है कि उस समय के राजनैतिक व सामाजिक हालात का इस आंदोलन के घटित होने में बहुत बड़ा रोल था। इस मामले का सबसे अहम आयाम, 1954 के सैन्य विद्रोह के बाद ईरान के संबंध में अमरीकी विदेश नीति थी। 1954 के सैन्य विद्रोह में मुसद्दिक़ की सरकार का तख़्ता पलटा गया ताकि अमरीका व ब्रिटेन की इच्छा से ईरान में शाह का अत्याचारी शासन मज़बूत हो। बाद में मीडिया में प्रकाशित दस्तावेज़ों से यह बात स्पष्ट हुयी कि 19 अगस्त 1953 के सैन्य विद्रोह में अमरीका का हाथ था। सीआईए द्वारा प्रकाशित दस्तावेज़ों से 19 अगस्त 1953 के विद्रोह में पश्चिमी देशों की संलिप्तता की पुष्टि होती है और स्वयं सीआईए ने इस विद्रोह में अपनी संलिप्तता को स्वीकार किया है। अमरीकी गुप्तचर संस्था सीआईए द्वारा आधिकारिक रूप से प्रकाशित दस्तावेज़ के अनुसार, सीआईए ने ईरान की तत्कालीन क़ानूनी सरकार को सैन्य विद्रोह के ज़रिए गिराने का षड्यंत्र दो महीना पहले तैयार किया था।

राजनैतिक व सामाजिक मामलों में अमरीका के प्रख्यात लेखक व अध्ययनकर्ता जेम्स बेल इस मामले में जनता के रक्तरंजित दमन के लिए सीधे सीधे अमरीकी सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं और लिखते हैं कि केनेडी की सुधार की नीति में एक रोचक बिंदु यह है कि अमरीका, किसी भी समय से अधिक ईरान के आंतरिक मामलों में फंस गया। सुधार की नीतियों के समर्थन के कारण, ईरान में मध्यम वर्ग के विशेष गुटों के बीच अमरीका की छवि बेहतर हो गई थी। इसके बावजूद शाह की सरकार ने पूरे देश में सड़कों व गलियों में हज़ारों निहत्थे ईरानी प्रदर्शनकारियों का हिंसक ढंग से दमन किया। इससे अमरीका की छवि पूरी तरह से ख़राब हो गई और शाह के भरपूर समर्थन के कारण अमरीकी सरकार इसके लिए ज़िम्मेदार थी।

इमाम ख़ुमैनी ने पंद्रह ख़ुर्दाद वर्ष 1342 हिजरी शमसी बराबर 5 जून 1963 बारे में कहा था कि यह दिन आशूरा के कारण ईरान की अत्याचारग्रस्त जनता के लिए आम शोक का दिन होने के साथ ही मुसलमानों के लिए शौर्य दिवस और नए इस्लाम के जन्म का दिन भी है। पंद्रह ख़ुर्दाद के दिन ईरानी जनता के कारनामे को श्रद्धांजली देना, पूरे इतिहास में मानवीय मूल्यों को श्रद्धांजली अर्पित करने जैसा है। इस दिन ईरानी जनता ने उठ खड़े हो कर शाह के अत्याचारी शासन की चूलें हिला दीं और उसके भ्रम को तोड़ दिया। पंद्रह ख़ुर्दाद के दिन ईरान के युवाओं व पुरुषों की शहादत ने शैतानी शक्ति के मज़बूत स्तंभों को धराशायी कर दिया। झोंपड़ियों में रहने वालों के ख़ून ने अत्याचार के महलों को ध्वस्त कर दिया। महान राष्ट्र ने अपने सपूतों के ख़ून का बलिदान देकर आगामी पीढ़ियों के लिए आंदोलन का द्वार खोल दिया और असंभव को संभव कर दिखाया।

अगर हम पंद्रह ख़ुर्दाद के आंदोलन की सबसे अहम विशेषताओं की बात करें तो इसका जनाधारित होना, इस्लामी होना और एक नेतृत्व का होना, मुख्य रूप से उल्लेखनीय हैं क्योंकि इससे पहले ईरान के किसी भी आंदोलन में ये तीनों बातें एक साथ सामने नहीं आई थीं। इस क्रांतिकारी आंदोलन ने वर्चस्ववादी व्यवस्था से संघर्ष के लिए ईरानी राष्ट्र के मनोबल को दुगना कर दिया। कहा जा सकता है कि वास्तव में पंद्रह ख़ुर्दाद की घटना ने क्रांतिकारी लक्ष्यों के आधार के साथ एक राजनैतिक आंदोलन के गठन के बीज बो दिए। इस ऐतिहासिक घटना में राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक, सभी तरह के तत्व दिखाए देते हैं और इन सभी तत्वों के समूह ने ईरानी राष्ट्र के प्रतिरोध से ले कर इस्लामी क्रांति की सफलता तक में निर्णायक भूमिका निभाई। यही कारण है कि बहुत से लोग पंद्रह ख़ुर्दाद वर्ष 1342 हिजरी शमसी बराबर 5 जून 1963 की घटना को इस्लामी क्रांति के गठन के मार्ग में निर्णायक मोड़ मानते हैं।

यह घटना ईरान के समकालीन और क्रांति के इतिहास में इतनी में अहम है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान के संविधान में इसका प्रत्यक्ष रूप से उल्लेख किया गया है। इस घटना के बाद प्रदर्शनों और विरोध का जो क्रम शुरू हुआ वह बाद के बरसों में नहीं रुका। पंद्रह ख़ुर्दाद के बाद से लेकर इस्लामी क्रांति की सफलता तक ईरान में क्रांतिकारी आंदोलन उसी मार्ग पर चलते रहे जिसका रेखांकन इमाम ख़ुमैनी ने किया था। ठोस साक्ष्यों से पता चलता है कि पंद्रह ख़ुर्दाद को जो जनसंहार किया गया था उसमें शाह की सरकार अकेली नहीं थी बल्कि अमरीका के अलावा ज़ायोनी शासन ने भी इसमें भूमिका निभाई थी।

ज़ायोनी शासन के तत्कालीन प्रधानमंत्री बिन गोरियान ने इस घटना के कुछ ही दिन बाद एक विशेष दूत के हाथ ईरान के शासक को एक पत्र भेजा। उन्होंने उस पत्र में लिखा था कि ईरान व इस्राईल की भूराजनैतिक स्थिति की मांग है कि दोनों सरकारें आंतरिक व बाहरी दुश्मनों से मुक़ाबले के लिए आपसी सहयोग में वृद्धि करें। अलबत्ता इमाम ख़ुमैनी ने अपने क्रांतिकारी आंदोलन को जारी रख कर और दुश्मनों से न डर कर यह दिखा दिया कि वास्तविक शक्ति जनता की होती है और बड़ी शक्तियों का सहारा लिए बिना भी एक बड़े राजनैतिक परिवर्तन की भूमि समतल की जा सकती है। इस परिवर्तन की चिंगारी पंद्रह ख़ुर्दाद के आंदोलन से निकली और इस्लामी क्रांति की सफलता तक एक ऐसा शोला बन गई जिसने बड़ी शक्तियों के हर संभव प्रयासों व षड्यंत्रों के बावजूद पूरी दुनिया को इस्लाम धर्म की राजनैतिक क्षमताओं से अवगत करा दिया।

सामाजिक व राजनैतिक दृष्टि से पंद्रह ख़ुर्दाद की घटना के बाद के ईरान के राजनैतिक हालात ने यह दर्शा दिया कि ईरानी राष्ट्र ने किसी भी समय राजनैतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व सैन्य मामलों में अमरीकी प्रभाव को स्वीकार नहीं किया है। इस आंदोलन का संदेश भी यही है कि अमरीकी वर्चस्व के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र जागरूक है और उसका दृढ़ता से मुक़ाबला करेगा। इमाम ख़ुमैनी ने अपनी दूरदर्शिता व राजनैतिक विचारों के माध्यम से ईरानी राष्ट्र में आत्म विश्वास पैदा कर दिया और उसे पश्चिम के मुक़ाबले में हीनभावना से बाहर निकाल दिया। ईरानी राष्ट्र का यह स्वाभिमान और आत्म विश्वास तनिक भी कम नहीं हुआ है और वर्चस्ववादी एवं साम्राज्यवादी शक्तियों के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की सफलताओं को सुनिश्चित बना रहा है।